tongues on the terrace


I woke up
Reeling in your scent
That stuck to my skin like
Humid sleepless nights

Last night,
Was cool and breezy
Your hands were warm
And your fingers moved
And grabbed and scratched
As if to summon
Those happy roving ghosts
From many moons ago

All the private rooms,
Were taken last night

While the naked moon
Mocked our clothed bodies
Our tongues on the terrace
Didn’t give a damn

They spoke with utter
The language of lovers
Who crossed rivers
And saw visions
Drowned and died
Lost all sanity,
And cried in joy

Our ambitions however, weren’t so lofty
Our intentions were carnal beyond repair
We liked playing sexy, and we played endlessly

“Somewhere, they say
She is churning the universe
Or weaving it’s fabric
Or lighting the fire
In the middle of sky
To cook up a world of pleasure”

“Enough of these
Cosmic platitudes
And useless ghosts
Stop the chase
And taste it now”

You craned back
And looked at the sky
I crawled under
And took a deep dive

I woke up feeling
Salty and sticky
The taste you left
On my tongue last night
Had spread to the rest
Of my body


clothesline on trrace


the scent of death




The scent of death is warm, moist, and always slightly crumpled
Bundled up in fists like loose earth, shredded like petals of rose
It is the smell of marigolds that accidentally burned in the pyre
And violets that shriveled on tombstones

It is that spectral whisper you catch, amidst the chaos of the ritual
Or a moment you take to taste her breath while in throes of passion
It is restless like a flock of birds fluttering their wings in alien lands
It is also familiar, like the morning newspaper, at the end of the day

It moves slowly and carefully, like the hands of a scavenger
hunting for bones, in the ashy aftermath of sacred fire
Or, it can be swift and jarring – intrusive – like memories
of dull dinners, tasteless sex, and imminent partings

Gloriously romantic, like romping lovers
touched by a hint of melancholy
under the winter sun
next to the creek

Or, it can come
like an even feeling
on a night of blue

Welling up in your shimmering eyes,
it flows down the length of my back
I taste it between your thighs
And always find it smeared
on your limitless lips

The scent of death is not climatic
It is not an interval either
It simmers like longing
stretching its limbs
forever in ecstasy
like a poem

छोटे से भी छोटा होना

Pomegranate_poem_drawing 1
तुम इतना धीरे धीरे चलकर भी
थक कैसे जाती हो?
तुम मेरी गति नहीं
पैर देखो- छोटे हैं
स्कूल का यूनिफार्म था
निक्कर के साथ एक बेल्ट थी
शर्ट के साथ एक बैज
निक्कर और शर्ट का
रंग नीला और नीला था
शर्ट का नीला दिन का आसमान था
निक्कर का नीला रात का समंदर
स्याही के धब्बे समंदर की जेब में
छिप जाते थे
लेकिन आसमान के कपड़े पर
साफ़ नज़र आते थे
सुनते सुनते चुप रहना
और बोलते बोलते सुनना
सुनते सुनते ज़रा रुककर बोलना
और बोलते बोलते ज़रा रुककर
सुबह सुबह जब पटरी पर
गाडी खिसकी
तब कोयल की कूक
इंजन की सीटी
में जा घुली
अकेले घर से निकलना
और पहली बार शहर आना
शहर से लौटकर घर न जाना
शहर में पहली बार
टूथपेस्ट का ख़त्म हो जाना
लोहे के सख्त ब्रिज पर दौड़ती
चलती ट्रेन की खुली खिड़की से
नानी का थमाया सिक्का
गोदावरी में छालना
और उसके गिरने की आवाज़
का इंतज़ार करना
इस शहर में
पतझड़ के आने का
कोई तय समय नहीं
और जाते हुए
उसे मैंने कभी देखा नहीं

छोटे से भी छोटा होकर
भीतर के भीतर जो
भीतर वाला कमरा है
उसकी बड़ी सी खिड़की से
कूदकर आकाश में जा गिरना
और घास पर लुढ़कना


You, are winter

Kahlil Gibran_Love_Winter

The Spring is deceptive – a fleeting orchestra of smells and sights. You can have it all, it says, and you recklessly go around plucking until the sun burns everything down. Summers irritate me. They are harsh and sweaty and yet, for some reason unbearably bright and cheerful. You try to laugh around, while an itch creeps up the unreachable middle of your back. Rains are humbling – they are not content with looking at you from far away. The drizzles invite you, and the thunders excite you. The rain washes all the plastic colours away and paints the landscape afresh. The destruction is romantic, the creation passionate. Rains teach you consequence. You can run naked in the fury of the season and return shivering – cold to your bones. The autumn nurses your heart. Separation is inevitable, it says. That when you fall, you fly. You are like the tree trunk – empty and naked, grateful for the occasional, distant warmth of the sun. Like the leaves, you are free and vulnerable to the winds. You feel coarse and dry, and yet, you know that it is the only way to break down. You know that no amount of trampling can destroy you completely. You can be broken down to bits as minute as particles of dust. And that like dust you can move slowly, and calmly and settle down. You move and you settle down, you settle down and you move. Autumn is not a season of many colours. It is a season of many shades of a single colour. In the several hundered shades of ochre, I look for my own loneliness.

Then winter comes, and says – you have been obsessing about the wrong thing. Loneliness is a futile figment to chase. For once, try solitude. Like your body, your solitude is your own. The warmth two bodies is never the same and every body nurtures a hundered different currents of heat. You touch the tips of your toes and are startled by their coldness. You reach for the gaps between them and find little pockets of warmth. Slowly, winter makes you map the temperature of your entire body – every curve a different degree. When two bodies meet in winters, they are not shocked at how differently they feel. Every touch is a recognition of your own patterns. Winter says, intimacies are for sharing, not devouring. You cannot taste without being tasted. You cannot consume without being consumed. You cannot speak without listening. Over the course of night, each body will go through its own trembles and its own silences. And the two pairs of feet will find their own corners under the blanket of love.

You, my love, are winter.



*painting: Kahlil Gibran



बैनेड्रिल और नेरुदा की याद

बैनेड्रिल का हैंगओवर कहाँ किसी शराब के हैंगओवर से कम होता है. आधी नींद में आँख खुली तो फेसबुक अपना वही निष्ठुर कार्यक्रम शुरू किये हुए था. मेमोरी वाला. स्मृतियों से ज़्यादा कठिन क्या होता है? फेसबुक मेमोरी पर क्लिक किया तो बहुत सारी अनचाही स्मृतियों के साथ नेरुदा आ टपके. आज उनका जन्मदिन है. वही नेरुदा जिसे मार्केज़ ने बीसवीं सदी का सबसे महान कवि मुक़र्रर किया था. वही नेरुदा जिसने सत्रह साल की उम्र में चेक कवि और पत्रकार जान नेरुदा के पागलपन में अपना नाम नेरुदा रख लिया था. अपने तेरहवें साल में वह खुद को नेफ्ताली रेयेस कहता था. इसी नाम से उसने अपनी पहली कविताएं लिखीं लेकिन जवान होने तक वह पाब्लो नेरुदा के नाम से पहचाना जाने लगा. हालाँकि उसका असली नाम रिकार्डो बासोअल्तो किसी को याद नहीं रहा. न ही उसे याद रखने की किसी को ज़हमत उठानी पड़ी. खुद नेरुदा को भी नहीं. अगर नेरुदा ने अपना नाम नहीं बदला होता? या नेरुदा पैदा ही नहीं हुआ होता? या लातिनी अमरीका का कोई आतंरिक युद्ध उसे लील गया होता ? तो क्या यह पृथ्वी ऐसी ही होती जैसी है? उसके मरने के चव्वालीस साल बाद भी हम मोटे से हरदम पाइप सुलगाने वाले आदमी को क्यों याद कर रहे हैं?

मुझे कभी नहीं मालूम था कि पाब्लो नेरुदा कौन है. जयपुर के केंद्रीय विद्यालय – 3 में थर्ड पीरियड मिस मीनू बांदीवाल का होता था. मैं दो बार ग्यारहवीं करके आया था और चाहता था बारहवीं जल्दी निबट जाए तो स्कूल से छुटकारा मिले. मीनू बांदीवाल क्लास में आईं और ‘कीपिंग क्वाइट’ कविता मुझे पढ़ने को कहा गया. मैं कीपिंग क्वाइट पढ़ रहा था और मुझे लगा कि कवि मुझ ही से बात कर रहा है. वो मेरे बगल में बैठे कुशाल से बात कर रहा है. वो हम सभी से एक साथ नहीं एक एक कर बात कर रहा है. राक्षसी प्रवृत्ति की मेरी क्लास पहली बार इतना मौन धारण किये हुए थी. किसी ने हमें इस तरह मौन रहने की हिदायत कभी दी ही नहीं थी. जिस तरह की कविताएं स्कूल में पढाई जाती रही हैं, सभी कवि तो उठने, जागने, लड़ने, कुछ तय करने को कह रहे थे. यह पहली बार हुआ जब किसी ने कहा कि मौन केवल चुप्पी नहीं बल्कि वह दृष्टिकोण है जससे सतह के नीचे जो घट रहा है सामने आएगा. हम जीवन में बेहतर निर्णय लेने में सक्षम होंगे. मार्केज़ को मैं थोड़ा पढ़ चुका था. जब पता चला कि मार्केज़ से लेकर चे तक सब इस कवि के मुरीद हैं तो जितना बस में आया पढ़ डाला गया. दिल्ली आने के बाद नेरुदा की महँगी किताबें खरीदने के लिए जेब में ज़्यादा पैसे नहीं थे तब इ.एच कार की ‘व्हाट इस हिस्ट्री’ कमला नगर में बेच कर ‘ट्वेंटी पोयम्स ऑफ़ लव एंड अ सांग ऑफ़ डेस्पेयर’ खरीद ली थी. अब लगता है कि ई.एच कार का ही श्राप है जिसकी वजह से ग्रेजुएशन के बाद इतिहास नहीं पढ़ पाया. पहली नौकरी लगने के बाद सबसे बड़ा सुख यह था की नाईट शिफ्ट्स में जितनी किताबों के प्रिंट निकाल सकते हों निकाल लिए जाएं. तनख्वाह जो इतनी कम मिलती है उसका हिसाब नेरुदा के प्रिंट आउटस ने पूरा कर दिया. नेरुदा नहीं होते तो किसने नमक, जुराब, टमाटर, बिखरी चीज़ों, टूटी चीज़ों, खिलौनों, नीबू, जीन्स और न जाने किस किस आम चीज़ पर कसीदे पढ़ उन्हें इतना ख़ास बनाया होता? वे नहीं होते तो कौन माचु पिचू के शिखरों पर ग्रन्थ लिख डालता? कौन अपनी प्रेमिका के लिए सदी की सबसे उदास पंक्तियाँ लिखता? कौन अपनी प्रेमिका को हज़ारों हज़ारों उपमाएं देता ?

हम सब जो विचारधाराओं के धंधे में फसे हुए लोग हैं उन्हें नेरुदा का 1971 में रेडियो कनाडा को दिया गया इंटरव्यू ज़रूर पढ़ना चाहिए. नेरुदा ने गरजते हुए कहा कि ‘मैं आपको बता रहा हूं कि मैं राजनीतिक कवि नहीं हूं. मैं उस वर्गीकरण से नफरत करता हूं जो मुझे विचारधारात्मक रूप से प्रतिबद्ध कविता के प्रतिनिधि के रूप में नामित करने पर जोर देती है. एक लेखक के रूप में मेरी महत्वाकांक्षा, यदि कोई महत्वाकांक्षा है, तो मुझे उन सभी चीजों के बारे में लिखना है जिन्हें मैं देखता हूं. मुझे पता है मैं प्यार करता हूं या मुझे नफरत है. लेकिन मुझे “श्रमिकों की दुनिया” की ओर इशारा करते हुए, आप मुझे नकली और उदार तरीके से जनता या संगठित श्रमिकों के दिग्गजों की चिंताओं के लिए प्रवक्ता बनाते हैं. वह मैं नहीं हूं. मैं केवल लैटिन अमेरिकी दुनिया की चिंताओं के समकालीन दुनिया की चिंताओं की मेरी कविता के एक निश्चित भाग की गूंज भर हूं. लेकिन मैं एक राजनीतिक कवि के रूप में वर्गीकृत होने से इनकार करता हूं. मैं चाँद का कवि हूं, मैं फूलों का कवि हूं, मैं प्यार का कवि हूं. जिसका अर्थ है कि मेरे पास कविता की एक बहुत पुरानी अवधारणा है जो मेरे द्वारा लिखी गई संभावना का खंडन नहीं करती है. मैं वह लिखना जारी रखता हूं जो समाज के विकास और प्रगति और शांति की शक्ति के लिए समर्पित है.’ नेरुदा सदी से सबसे महान प्रेम गीत इसलिए लिख पाए क्योंकि वे जानते थे कि उनकी कविता का जन्म पर्वत और नदी के बीच किसी जगह में हुआ है. बारिश की बूंदों से उनकी कविता को आवाज़ मिली है और वह घने अरण्य में छिपे किसी पेड़ से लिपटी रहती है.

नेरुदा को पढ़ना कभी इजाज़त में नसीरुद्दीन शाह और रेखा को रेलवे स्टेशन के उदासीन वेटिंग रूम में बैठे देखना होता है. कभी पक चुकी कढ़ी में मेथी का तड़का लगाने जैसा. नेरुदा की भाषा लोर्का या बौदलेयर की तरह चूसनी नहीं पड़ती, वह अपने आप आपकी जीभ पर पिघलती चलती है. आपकी भौहों को खुजाती चलती है. आप उसे हथेलिओं में आए पसीने की तरह महसूस कर सकते हैं. एक ही कविता में नेरुदा पूछते हैं –

मुझे बताओ, ये गुलाब यूँ ही उघाड़ा रहता है
या यही इसका श्रृंगार है?


बारिश में खड़ी ,गतिहीन रेलगाड़ी से ज्यादा उदास
दुनिया में और क्या चीज हो सकती है?

इसलिए नेरुदा की कविताओं को आप पायजामे की तरह पहन बाजार से आध पाव नीबू खरीदने जाएंगे, तो कुछ शब्द रेहड़ी पर ज़रूर छोड़ आएँगे.

– मलयानिल