बैनेड्रिल और नेरुदा की याद

बैनेड्रिल का हैंगओवर कहाँ किसी शराब के हैंगओवर से कम होता है. आधी नींद में आँख खुली तो फेसबुक अपना वही निष्ठुर कार्यक्रम शुरू किये हुए था. मेमोरी वाला. स्मृतियों से ज़्यादा कठिन क्या होता है? फेसबुक मेमोरी पर क्लिक किया तो बहुत सारी अनचाही स्मृतियों के साथ नेरुदा आ टपके. आज उनका जन्मदिन है. वही नेरुदा जिसे मार्केज़ ने बीसवीं सदी का सबसे महान कवि मुक़र्रर किया था. वही नेरुदा जिसने सत्रह साल की उम्र में चेक कवि और पत्रकार जान नेरुदा के पागलपन में अपना नाम नेरुदा रख लिया था. अपने तेरहवें साल में वह खुद को नेफ्ताली रेयेस कहता था. इसी नाम से उसने अपनी पहली कविताएं लिखीं लेकिन जवान होने तक वह पाब्लो नेरुदा के नाम से पहचाना जाने लगा. हालाँकि उसका असली नाम रिकार्डो बासोअल्तो किसी को याद नहीं रहा. न ही उसे याद रखने की किसी को ज़हमत उठानी पड़ी. खुद नेरुदा को भी नहीं. अगर नेरुदा ने अपना नाम नहीं बदला होता? या नेरुदा पैदा ही नहीं हुआ होता? या लातिनी अमरीका का कोई आतंरिक युद्ध उसे लील गया होता ? तो क्या यह पृथ्वी ऐसी ही होती जैसी है? उसके मरने के चव्वालीस साल बाद भी हम मोटे से हरदम पाइप सुलगाने वाले आदमी को क्यों याद कर रहे हैं?

मुझे कभी नहीं मालूम था कि पाब्लो नेरुदा कौन है. जयपुर के केंद्रीय विद्यालय – 3 में थर्ड पीरियड मिस मीनू बांदीवाल का होता था. मैं दो बार ग्यारहवीं करके आया था और चाहता था बारहवीं जल्दी निबट जाए तो स्कूल से छुटकारा मिले. मीनू बांदीवाल क्लास में आईं और ‘कीपिंग क्वाइट’ कविता मुझे पढ़ने को कहा गया. मैं कीपिंग क्वाइट पढ़ रहा था और मुझे लगा कि कवि मुझ ही से बात कर रहा है. वो मेरे बगल में बैठे कुशाल से बात कर रहा है. वो हम सभी से एक साथ नहीं एक एक कर बात कर रहा है. राक्षसी प्रवृत्ति की मेरी क्लास पहली बार इतना मौन धारण किये हुए थी. किसी ने हमें इस तरह मौन रहने की हिदायत कभी दी ही नहीं थी. जिस तरह की कविताएं स्कूल में पढाई जाती रही हैं, सभी कवि तो उठने, जागने, लड़ने, कुछ तय करने को कह रहे थे. यह पहली बार हुआ जब किसी ने कहा कि मौन केवल चुप्पी नहीं बल्कि वह दृष्टिकोण है जससे सतह के नीचे जो घट रहा है सामने आएगा. हम जीवन में बेहतर निर्णय लेने में सक्षम होंगे. मार्केज़ को मैं थोड़ा पढ़ चुका था. जब पता चला कि मार्केज़ से लेकर चे तक सब इस कवि के मुरीद हैं तो जितना बस में आया पढ़ डाला गया. दिल्ली आने के बाद नेरुदा की महँगी किताबें खरीदने के लिए जेब में ज़्यादा पैसे नहीं थे तब इ.एच कार की ‘व्हाट इस हिस्ट्री’ कमला नगर में बेच कर ‘ट्वेंटी पोयम्स ऑफ़ लव एंड अ सांग ऑफ़ डेस्पेयर’ खरीद ली थी. अब लगता है कि ई.एच कार का ही श्राप है जिसकी वजह से ग्रेजुएशन के बाद इतिहास नहीं पढ़ पाया. पहली नौकरी लगने के बाद सबसे बड़ा सुख यह था की नाईट शिफ्ट्स में जितनी किताबों के प्रिंट निकाल सकते हों निकाल लिए जाएं. तनख्वाह जो इतनी कम मिलती है उसका हिसाब नेरुदा के प्रिंट आउटस ने पूरा कर दिया. नेरुदा नहीं होते तो किसने नमक, जुराब, टमाटर, बिखरी चीज़ों, टूटी चीज़ों, खिलौनों, नीबू, जीन्स और न जाने किस किस आम चीज़ पर कसीदे पढ़ उन्हें इतना ख़ास बनाया होता? वे नहीं होते तो कौन माचु पिचू के शिखरों पर ग्रन्थ लिख डालता? कौन अपनी प्रेमिका के लिए सदी की सबसे उदास पंक्तियाँ लिखता? कौन अपनी प्रेमिका को हज़ारों हज़ारों उपमाएं देता ?

हम सब जो विचारधाराओं के धंधे में फसे हुए लोग हैं उन्हें नेरुदा का 1971 में रेडियो कनाडा को दिया गया इंटरव्यू ज़रूर पढ़ना चाहिए. नेरुदा ने गरजते हुए कहा कि ‘मैं आपको बता रहा हूं कि मैं राजनीतिक कवि नहीं हूं. मैं उस वर्गीकरण से नफरत करता हूं जो मुझे विचारधारात्मक रूप से प्रतिबद्ध कविता के प्रतिनिधि के रूप में नामित करने पर जोर देती है. एक लेखक के रूप में मेरी महत्वाकांक्षा, यदि कोई महत्वाकांक्षा है, तो मुझे उन सभी चीजों के बारे में लिखना है जिन्हें मैं देखता हूं. मुझे पता है मैं प्यार करता हूं या मुझे नफरत है. लेकिन मुझे “श्रमिकों की दुनिया” की ओर इशारा करते हुए, आप मुझे नकली और उदार तरीके से जनता या संगठित श्रमिकों के दिग्गजों की चिंताओं के लिए प्रवक्ता बनाते हैं. वह मैं नहीं हूं. मैं केवल लैटिन अमेरिकी दुनिया की चिंताओं के समकालीन दुनिया की चिंताओं की मेरी कविता के एक निश्चित भाग की गूंज भर हूं. लेकिन मैं एक राजनीतिक कवि के रूप में वर्गीकृत होने से इनकार करता हूं. मैं चाँद का कवि हूं, मैं फूलों का कवि हूं, मैं प्यार का कवि हूं. जिसका अर्थ है कि मेरे पास कविता की एक बहुत पुरानी अवधारणा है जो मेरे द्वारा लिखी गई संभावना का खंडन नहीं करती है. मैं वह लिखना जारी रखता हूं जो समाज के विकास और प्रगति और शांति की शक्ति के लिए समर्पित है.’ नेरुदा सदी से सबसे महान प्रेम गीत इसलिए लिख पाए क्योंकि वे जानते थे कि उनकी कविता का जन्म पर्वत और नदी के बीच किसी जगह में हुआ है. बारिश की बूंदों से उनकी कविता को आवाज़ मिली है और वह घने अरण्य में छिपे किसी पेड़ से लिपटी रहती है.

नेरुदा को पढ़ना कभी इजाज़त में नसीरुद्दीन शाह और रेखा को रेलवे स्टेशन के उदासीन वेटिंग रूम में बैठे देखना होता है. कभी पक चुकी कढ़ी में मेथी का तड़का लगाने जैसा. नेरुदा की भाषा लोर्का या बौदलेयर की तरह चूसनी नहीं पड़ती, वह अपने आप आपकी जीभ पर पिघलती चलती है. आपकी भौहों को खुजाती चलती है. आप उसे हथेलिओं में आए पसीने की तरह महसूस कर सकते हैं. एक ही कविता में नेरुदा पूछते हैं –

मुझे बताओ, ये गुलाब यूँ ही उघाड़ा रहता है
या यही इसका श्रृंगार है?

और

बारिश में खड़ी ,गतिहीन रेलगाड़ी से ज्यादा उदास
दुनिया में और क्या चीज हो सकती है?

इसलिए नेरुदा की कविताओं को आप पायजामे की तरह पहन बाजार से आध पाव नीबू खरीदने जाएंगे, तो कुछ शब्द रेहड़ी पर ज़रूर छोड़ आएँगे.

– मलयानिल

Selfless

image

Dear me,

There’s a lot that can be said right now, but I’m going to keep it simple. At least try to. Sincerely.

Let us look at it this way. Begin.

My dear fellow. You. You are a manifestation of the perceived species around you. And then you filter through that but still sell anyway. It is now acceptable to do so. You do not chase experiences of the past. You only regurgitate them during moments of great indigestion, hopefully maintaining a straight face. You do not keep that matchstick at the exact location of where your elbow once was when you were slightly more hazed, but away child, away*

*Away I say.

*Let us also (pronounced “oulso”) laugh. Haha.

*Okay.

*Beat change.

Let not that wave of boredom coax you into that being of wasted karma.

You are not special.

But still,
stay.

Yours sincerely,
Me

Picture courtesy: Marcos Montiel