tHe SToryTEller and The IntRodUctioN

 

Like many people, my relationship with my father has been a complex one. Or atleast, for the sake of telling a story in a storylike way it is best to describe the relationship that way. One cannot deny its complexity, which I alone can verify in any case. The complexity of our relationship comes from both of us being objects of fascination to each other, often becoming caricatures of our roles as daughter and father. But not the good sort of caricatures of daughter and father but the poor sort, one always lacking in feature to be the good sort.
The good sort I believe comes to some use as reference in this particular tale of telling. The sort that has acquired the cringworthy comparison of Princess and Hero. Daughters as princesses and fathers as heroes of the daughters who are princesses. The reason I say this may be a useful point of reference is not to simply signify that my relationship with my father is far from any princess-hero rubbish, which it most certainly is- far from, that is. In an odd sense of term however this father of mine has played a particular kind of hero in many stories I have told. Mainly because it is the hero himself who has narrated many of the stories I simply repeat- and admittedly not relayed that they were all from another source. With this attribution, I must comment on how many times heroes narrate their own stories as heroes. One may say that this is a particular trait of heroism- to sing of one’s own valour, lest another may hesitate.
My father is a gifted storyteller. In that, I have secured my opening line to a story of my own telling which characterises him as the storyteller. This ploy has worked one too many times if I may say so myself. To what may face some derision if he were to be in the know, everytime I use this ploy it is to cast this father of mine as the unfortunate anti-hero to justify my politics. He becomes a villainous casteist, the ‘benevolent oppressor’, the misogynist, the patriarch, the manipulator and the easily manipulated. Now you see what I mean by not fitting into the princess caricature. At this point, my father who is a gifted storyteller would turn up his nose and tone filled with condescension point out to me that a story written in complicated sentences cannot be much of a story at all. Which mine are. His stories are long and end in other stories, but one may notice that his sentences are not long. They also have that particular feature of daddies who are heroes and are not, where the sentences trail when imbued with some emotion. To find completion would be horrendous and end in abrupt tellings of tales.
As the object of my stories, this father has played hero in all stories where I make a case against said heroism. I imagine that in all his long hours alone at home, he spins tales of me as the object of his stories as well. A princess who is anything but. He must in his long stories put me in various scenarios where I have not been a princess to illustrate how I must not be seen as one. In these tales I imagine, that as a gifted storyteller with an immense talent for description he will dress me in flowery pants and red lisptick. My red lipstick has become a source of some worry to him. The flowery pants were a mistake he made on my 10th birthday. In these tales he concocts while sitting on the dull grey sofa cover he chose, I must have long arguments about communism, economics and the best way to cut mangoes in the English he resents my command over.
The few times our eyes meet reluctantly over discussing steel plates at lunch, our individual tales of princesses and heroes collapse into the mindless mundane. My relationship with this father of mine is complex I imagine, because we are used to our distaste of each other in flowery pants and misogynist triumph.

*image from The Storyteller, Evan Turk
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Sujata

An iron bucket screeches as it is dragged against the cement floor.

This was the sound of summer while Sujatha was alive… Or at least till she was packed away to the hospital, when for the first time a maid set foot inside her home. Until then, Sujatha was adamant to keep the chores of her home to herself.

I’m four, five, six or seven years old. The iron bucket wakes me up every summer morning… mornings soaked in the vacuous lull of the vacation… soaked like an old tattered cloth in Sujatha’s hands. Awake but unwilling to wake up, I listen to the cloth as it infiltrates the surface of the water in the bucket, drowns, and is suddenly pulled out by Sujatha’s noiseless hands – triggering the pitter-patter grumble of the dripping water.

Noiseless hands, noiseless feet and a ruined damp cloth mop the floor so unobtrusively that every morning I feel that Sujatha has slipped away suddenly. Hers was a noiseless presence. Small, firm, noiseless presence.

Bent over the red-oxide floor, she is painting it with successive damp strokes – each vanishing as soon as the other appears. “Sujatha?” I mutter, failing to see her bent figure, though aware of her presence – noiseless, invisible. “Hmm” she says silently. And I sink deeper into the thin blanket, prolonging the comfort of the bed and Sujatha’s presence revolving around it.

It’s not always that I would call her “Sujatha”, by her name.

“I don’t mind, but you can’t call me Sujatha in front of others. Amamma is fine’.

Amamma… Amma’s amma.  For me, just Sujatha. Who lived and passed away in graceful noiselessness.

An iron bucket screeches.

बैनेड्रिल और नेरुदा की याद

बैनेड्रिल का हैंगओवर कहाँ किसी शराब के हैंगओवर से कम होता है. आधी नींद में आँख खुली तो फेसबुक अपना वही निष्ठुर कार्यक्रम शुरू किये हुए था. मेमोरी वाला. स्मृतियों से ज़्यादा कठिन क्या होता है? फेसबुक मेमोरी पर क्लिक किया तो बहुत सारी अनचाही स्मृतियों के साथ नेरुदा आ टपके. आज उनका जन्मदिन है. वही नेरुदा जिसे मार्केज़ ने बीसवीं सदी का सबसे महान कवि मुक़र्रर किया था. वही नेरुदा जिसने सत्रह साल की उम्र में चेक कवि और पत्रकार जान नेरुदा के पागलपन में अपना नाम नेरुदा रख लिया था. अपने तेरहवें साल में वह खुद को नेफ्ताली रेयेस कहता था. इसी नाम से उसने अपनी पहली कविताएं लिखीं लेकिन जवान होने तक वह पाब्लो नेरुदा के नाम से पहचाना जाने लगा. हालाँकि उसका असली नाम रिकार्डो बासोअल्तो किसी को याद नहीं रहा. न ही उसे याद रखने की किसी को ज़हमत उठानी पड़ी. खुद नेरुदा को भी नहीं. अगर नेरुदा ने अपना नाम नहीं बदला होता? या नेरुदा पैदा ही नहीं हुआ होता? या लातिनी अमरीका का कोई आतंरिक युद्ध उसे लील गया होता ? तो क्या यह पृथ्वी ऐसी ही होती जैसी है? उसके मरने के चव्वालीस साल बाद भी हम मोटे से हरदम पाइप सुलगाने वाले आदमी को क्यों याद कर रहे हैं?

मुझे कभी नहीं मालूम था कि पाब्लो नेरुदा कौन है. जयपुर के केंद्रीय विद्यालय – 3 में थर्ड पीरियड मिस मीनू बांदीवाल का होता था. मैं दो बार ग्यारहवीं करके आया था और चाहता था बारहवीं जल्दी निबट जाए तो स्कूल से छुटकारा मिले. मीनू बांदीवाल क्लास में आईं और ‘कीपिंग क्वाइट’ कविता मुझे पढ़ने को कहा गया. मैं कीपिंग क्वाइट पढ़ रहा था और मुझे लगा कि कवि मुझ ही से बात कर रहा है. वो मेरे बगल में बैठे कुशाल से बात कर रहा है. वो हम सभी से एक साथ नहीं एक एक कर बात कर रहा है. राक्षसी प्रवृत्ति की मेरी क्लास पहली बार इतना मौन धारण किये हुए थी. किसी ने हमें इस तरह मौन रहने की हिदायत कभी दी ही नहीं थी. जिस तरह की कविताएं स्कूल में पढाई जाती रही हैं, सभी कवि तो उठने, जागने, लड़ने, कुछ तय करने को कह रहे थे. यह पहली बार हुआ जब किसी ने कहा कि मौन केवल चुप्पी नहीं बल्कि वह दृष्टिकोण है जससे सतह के नीचे जो घट रहा है सामने आएगा. हम जीवन में बेहतर निर्णय लेने में सक्षम होंगे. मार्केज़ को मैं थोड़ा पढ़ चुका था. जब पता चला कि मार्केज़ से लेकर चे तक सब इस कवि के मुरीद हैं तो जितना बस में आया पढ़ डाला गया. दिल्ली आने के बाद नेरुदा की महँगी किताबें खरीदने के लिए जेब में ज़्यादा पैसे नहीं थे तब इ.एच कार की ‘व्हाट इस हिस्ट्री’ कमला नगर में बेच कर ‘ट्वेंटी पोयम्स ऑफ़ लव एंड अ सांग ऑफ़ डेस्पेयर’ खरीद ली थी. अब लगता है कि ई.एच कार का ही श्राप है जिसकी वजह से ग्रेजुएशन के बाद इतिहास नहीं पढ़ पाया. पहली नौकरी लगने के बाद सबसे बड़ा सुख यह था की नाईट शिफ्ट्स में जितनी किताबों के प्रिंट निकाल सकते हों निकाल लिए जाएं. तनख्वाह जो इतनी कम मिलती है उसका हिसाब नेरुदा के प्रिंट आउटस ने पूरा कर दिया. नेरुदा नहीं होते तो किसने नमक, जुराब, टमाटर, बिखरी चीज़ों, टूटी चीज़ों, खिलौनों, नीबू, जीन्स और न जाने किस किस आम चीज़ पर कसीदे पढ़ उन्हें इतना ख़ास बनाया होता? वे नहीं होते तो कौन माचु पिचू के शिखरों पर ग्रन्थ लिख डालता? कौन अपनी प्रेमिका के लिए सदी की सबसे उदास पंक्तियाँ लिखता? कौन अपनी प्रेमिका को हज़ारों हज़ारों उपमाएं देता ?

हम सब जो विचारधाराओं के धंधे में फसे हुए लोग हैं उन्हें नेरुदा का 1971 में रेडियो कनाडा को दिया गया इंटरव्यू ज़रूर पढ़ना चाहिए. नेरुदा ने गरजते हुए कहा कि ‘मैं आपको बता रहा हूं कि मैं राजनीतिक कवि नहीं हूं. मैं उस वर्गीकरण से नफरत करता हूं जो मुझे विचारधारात्मक रूप से प्रतिबद्ध कविता के प्रतिनिधि के रूप में नामित करने पर जोर देती है. एक लेखक के रूप में मेरी महत्वाकांक्षा, यदि कोई महत्वाकांक्षा है, तो मुझे उन सभी चीजों के बारे में लिखना है जिन्हें मैं देखता हूं. मुझे पता है मैं प्यार करता हूं या मुझे नफरत है. लेकिन मुझे “श्रमिकों की दुनिया” की ओर इशारा करते हुए, आप मुझे नकली और उदार तरीके से जनता या संगठित श्रमिकों के दिग्गजों की चिंताओं के लिए प्रवक्ता बनाते हैं. वह मैं नहीं हूं. मैं केवल लैटिन अमेरिकी दुनिया की चिंताओं के समकालीन दुनिया की चिंताओं की मेरी कविता के एक निश्चित भाग की गूंज भर हूं. लेकिन मैं एक राजनीतिक कवि के रूप में वर्गीकृत होने से इनकार करता हूं. मैं चाँद का कवि हूं, मैं फूलों का कवि हूं, मैं प्यार का कवि हूं. जिसका अर्थ है कि मेरे पास कविता की एक बहुत पुरानी अवधारणा है जो मेरे द्वारा लिखी गई संभावना का खंडन नहीं करती है. मैं वह लिखना जारी रखता हूं जो समाज के विकास और प्रगति और शांति की शक्ति के लिए समर्पित है.’ नेरुदा सदी से सबसे महान प्रेम गीत इसलिए लिख पाए क्योंकि वे जानते थे कि उनकी कविता का जन्म पर्वत और नदी के बीच किसी जगह में हुआ है. बारिश की बूंदों से उनकी कविता को आवाज़ मिली है और वह घने अरण्य में छिपे किसी पेड़ से लिपटी रहती है.

नेरुदा को पढ़ना कभी इजाज़त में नसीरुद्दीन शाह और रेखा को रेलवे स्टेशन के उदासीन वेटिंग रूम में बैठे देखना होता है. कभी पक चुकी कढ़ी में मेथी का तड़का लगाने जैसा. नेरुदा की भाषा लोर्का या बौदलेयर की तरह चूसनी नहीं पड़ती, वह अपने आप आपकी जीभ पर पिघलती चलती है. आपकी भौहों को खुजाती चलती है. आप उसे हथेलिओं में आए पसीने की तरह महसूस कर सकते हैं. एक ही कविता में नेरुदा पूछते हैं –

मुझे बताओ, ये गुलाब यूँ ही उघाड़ा रहता है
या यही इसका श्रृंगार है?

और

बारिश में खड़ी ,गतिहीन रेलगाड़ी से ज्यादा उदास
दुनिया में और क्या चीज हो सकती है?

इसलिए नेरुदा की कविताओं को आप पायजामे की तरह पहन बाजार से आध पाव नीबू खरीदने जाएंगे, तो कुछ शब्द रेहड़ी पर ज़रूर छोड़ आएँगे.

– मलयानिल

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There are two reasons why you’d find a crowd in front of a shop in Kerala. One, it’s pouring: aunties with their big black umbrellas, hold up their sarees as the roads turn into rivulets; men with their well-oiled hair and their lungis tucked above their knees, won’t risk riding their bikes in this rain. The only other reason is that there is a strike/ a hartal, and there’s a queue of men outside an unassuming looking rickety old shop, with a small board in yellow that reads TODDY. Today it’s both. In the peak of the monsoon season, Kerala rid of its tourists and its sweltering heat takes a break and watches the rains. Life comes to a standstill. Nothing here works when there’s a strike and no one moves when it rains. In a country that celebrates religious holidays every other week, communist Kerala depends on the rains and hartals for a celebratory glass of toddy and fish fry.

Kerala, a small coastal state in the south of India is a place of indescribable beauty, and describable cliches. There’s green everywhere, in every possible shade- the green of the paddy fields, the green of the mango too raw, in the peacocks, in the hills, in the moss on the streets, in the ponds and the luridly painted houses. It’s an artist’s muse. But that is the tourist’s Kerala. The Kerala that is my native place and feel forced to visit every year is that of pettiness, party politics, overbearing relatives and houses that reek of fish and wetness. A place that rings of familiarity while still being completely alien to me. My romance with Kerala, comes from a nostalgia that doesn’t exist. Nostalgia for a past I created through stories.

My father is a brilliant storyteller. His stories of growing up in his hometown were coloured with the idea of growing up in a large ancestral home- a joint family household that owned most of the land in the village. He had 5 brothers and two sisters and numerous cousins for company, they played in mangroves, had little interest in school, and had servants to cater to every need. He also spoke of times of strife, of experiencing poverty as the landlord system changed after Independence, the caste system being abolished, the family separating. Having grown up in a big city and never having seen his ancestral home, this was the Kerala I dreamt of. The reality only disappointed me year after year. I wanted an elephant in my courtyard, a temple in my backyard, and to walk down streets my family owned. We merely retained the name, as new houses were built on old land and old servants became the new elite— nouveau riche, if you will. It was class over caste.

excerpt from Vidooshakan- the Harlequin

 

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Somewhere in the hills, there is a cottage without our name on its door front. My love, you and I will find our romance in daily chores and shades of silence.

When it is cold, we will dust old sweaters and discard them for blankets and the warmth of our bodies. When it is wet, we will go outside to hold each other steady in wet mud. You can write and I can read and we will make our lives of book shelves and papercuts.

There will be ink on your fingers, on my neck and my waist. Green glass bangles will break when we cook.  Rain to wipe our sweat, salt to satiate the spice.

smoke and mirrors. smoke and mirrors.

“super rude ashoka already homage Erika” (or, honest YouTube subtitles)

 

गाना – Title: दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर – I’ll make you sit in the window of my heart
चित्रपट – Film: ब्रह्मचारी – Bramhachari
संगीतकार – Music Director: शंकर – जयकिशन – Shankar Jaikishan
गीतकार – Lyricist: हसरत – Hasrat
गायक – Singer(s): मोहम्मद रफ़ी – Mohammad Rafi
नायक, नायिका, खलनायक – Actor(s): शम्मी कपूर, राजश्री, प्राण – Shammi Kapoor, Rajshree, Pran

उपशीर्षक – Subtitles: अंग्रेगी स्व उत्पन्न – English Auto Generated

 

1 dil ke2 dil ke3 dil ke5 dil ke6 dil ke7 dil ke

*song starts8 a dil ke8 b dil ke8 dil ke9 dil ke10 dil ke11 dil ke12 dil ke13 dil ke14 dil ke15 dil ke16 dil ke17 dil ke18 dil ke19 dil ke20 dil ke

*end of song21 dil ke

अपना अपना चाँद

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अपनी अपनी आँखें हैं तो अपना अपना क़िस्सा होगा
अपनी अपनी ज़बान का अपना अपना लहज़ा होगा

अपनी अपनी पीठ के नीचे अपना अपना दर्द टिकेगा
अपने अपने कान के पीछे अपना अपना धूल बसेगा

अपने अपने अपनों का अपना अपना दूसरा होगा
हर तीसरी नुककड़ का अपना अपना झगड़ा होगा

अपनी अपनी शिकायतों की अपनी अपनी रसीदें होंगी
अपनी अपनी आंसुओं का अपना अपना फ़ायदा होगा

अपनी अपनी हंसी के पीछे अपनी अपनी हार होगी
अपने अपने मोज़ों में छिपी अपनी अपनी शर्म होगी

अपने अपने पैरों तले अपना अपना आकाश खुलेगा
अपने अपने तारों के बीच अपना अपना सा चाँद होगा.

***

 

पोस्ट स्क्रिप्ट:
…प्रेम की एक ही पाती
पर रोज़ अलग अलग
अदाओं के साथ
बाँचती ये तीन औरतें
खट्टी-मीठी नज़रों से
दुनिया को देखती हुई
बुनती रहती हैं
हाथों से
अपना अपना चाँद…

शुक्ला चौधुरी  (तीन गर्भवती महिलाएँ)